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हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: 8 साल की सेवा पूरी करने वाले ग्रामीण विद्या उपासक होंगे नियमित

  • हिमाचल हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, 8 साल की सेवा पूरी करने वाले ग्रामीण विद्या उपासक होंगे नियमित

  • याचिकाकर्ताओं को वरिष्ठता, वेतन वृद्धि और पदोन्नति समेत सभी परिणामी लाभ देने के सख्त निर्देश

  • सरकार की टीईटी और कट-ऑफ तारीख की आपत्तियां खारिज, 2001 से दुर्गम क्षेत्रों में दे रहे थे सेवाएं


शिमला। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने राज्य के ग्रामीण, दुर्गम और जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ बनकर सेवाएं देने वाले शिक्षकों के हक में एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि ग्रामीण विद्या उपासक के रूप में 8 वर्ष की निरंतर सेवा पूरी करने वाले याचिकाकर्ताओं की सेवाओं को समयबद्ध नियमित किया जाए। इसके साथ ही उन्हें वरिष्ठता, वार्षिक वेतन वृद्धि और पदोन्नति सहित सभी परिणामी वित्तीय लाभ प्रदान करने के आदेश दिए गए हैं।

यह ऐतिहासिक निर्णय न्यायाधीश जिया लाल भारद्वाज की खंडपीठ ने ओम प्रकाश एवं अन्य की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ताओं को प्रारंभिक तौर पर वर्ष 2001 से 2004 के बीच सबसे दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा गारंटी योजना (ईजीएस) और वैकल्पिक स्थान स्कूली शिक्षा केंद्रों के संचालन के लिए शिक्षा स्वयंसेवक अथवा प्रशिक्षक के रूप में तैनात किया गया था।

वर्ष 2009 में सरकार ने नीतिगत निर्णय लेकर 4 साल के अनुभव और 12वीं कक्षा की योग्यता वाले ईजीएस प्रशिक्षकों को अनुबंध पर ग्रामीण विद्या उपासक बनाया था। इसके बाद 16 अगस्त 2011 को नीति लाई गई, जिसमें 8 साल की सेवा पूरी करने वालों को स्पेशल जेबीटी प्रमाणपत्र देकर नियमित करने का प्रावधान था। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकार ने तय 8 वर्षों के बजाय उन्हें 11 साल से अधिक के लंबे इंतजार के बाद वर्ष 2021 में नियमित किया, जिससे वे वरिष्ठता और वित्तीय लाभों से वंचित रह गए।

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि याचिकाकर्ताओं के पास शिक्षा का अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत टीईटी जैसी अनिवार्य योग्यताएं नहीं थीं और वे कट-ऑफ तारीख के दायरे से बाहर थे। हालांकि, हाईकोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि जब सरकार ने खुद नीति बनाकर समान कर्मचारियों को 8 साल की सेवा के बाद नियमित किया है, तो कठिन व जनजातीय इलाकों में दशकों से पढ़ा रहे इन शिक्षकों को उनके जायज हक से वंचित नहीं रखा जा सकता।